Srinivasa Ramanujan / श्रीनिवास रामानुजन् एक महान भारतीय गण

तमिल नाडु पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर माता का नाम कोमलताम्मल राष्ट्रीयता भारतीय शिक्षा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पत्नी जानकीअम्माल संतान N/A उल्लेखनीय कार्य इन्होने 3884 इक्वेशन बनाईं. इन्होने शून्य और अनन्त को हमेशा ध्यान में रखा और इसके अंतर्सम्बन्धों को समझाने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। वह अपनी विख्यात खोज गोलिय विधि (Circle Method) के लिए भी जाने जाते है. मृत्यु 26 अप्रैल, खांसी और पतला होने के कारण उनकी हालत गंभीर होती गई। धीरे-धीरे डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। उनका अंतिम समय नजदीक आ गया था। अपनी बीमारी से लड़ते-लड़ते अंततः 26 अप्रैल 1920 को उन्होने प्राण त्याग दिए। मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 33 वर्ष थी। इस महान गणितग्य का निधन गणित जगत के लिए अपूरणीय क्षति था। रामानुजन् ने अपनी 32 साल की लाइफ में 3884 इक्वेशन बनाईं। इनमें से कई तो आज भी अनसुलझी है। मैथ में 1729 को रामानुजन संख्या के नाम से जाना जाता है। श्रीनिवास रामानुजन् को “Man Who Knew Infinty” कहा जाता है क्योकिं इनके प्रमुख योगदान में से 60% से ज्यादा Infinite series के सूत्र थे। और अधिक लेख Please Note : – Srinivasa Ramanujan Biography Life History In Hindi मे दी गयी Information अच्छी लगी हो तो कृपया हमारा  फ़ेसबुक (Facebook)   पेज लाइक करे या कोई टिप्पणी (Comments) हो तो नीचे करे। Srinivasa Ramanujan Essay  Life Story In Hindi व नयी पोस्ट डाइरेक्ट ईमेल मे पाने के लिए  Free Email Subscribe  करे, ए सिनोप्सिस आफ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स (Synopsis of Elementary Results in Pure and Applied Mathematics)’ लेखक थे ‘जार्ज एस. कार्र (George Shoobridge Carr) ।’ रामानुजन ने जार्ज एस. कार्र की गणित के परिणामों पर लिखी किताब पढ़ी और इस पुस्तक से प्रभावित होकर स्वयं ही गणित पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। इस पुस्तक में उच्च गणित के कुल 6165 फार्मूले दिये गये थे। जिन्हें रामानुजन ने केवल 16 साल की आयु में पूरी तरह आत्मसात कर लिया था। रामानुजन ने कुछ ही दिनों में सभी फार्मूलों को बिना किसी की मदद लिये हुए सिद्ध कर लिया। इस ग्रन्थ को हल करते समय उन्होंने अनेक नयी खोजें (नयी प्रमेय) कर डालीं। बारहवीं में दो बार फेल होने के बाद वर्ष 1908 में इनके माता पिता ने इनका विवाह जानकी नामक कन्या से कर दिया। विवाह हो जाने के बाद अब इनके लिए सब कुछ भूल कर गणित में डूबना संभव नहीं था। इसके पश्चात उन्हे नौकरी की तलाश थी बहुत प्रयास करने पर उन्हे मुश्किल से 25 रुपए माहवार की कलर्क की नौकरी मिली। रामानुजन को अपनी माता से काफी लगाव था। अपनी माँ से रामानुजन ने प्राचीन परम्पराओ और पुराणों के बारे में सीखा था। उन्होंने बहोत से धार्मिक भजनों को गाना भी सीख लिया था ताकि वे आसानी से मंदिर में कभी-कभी गा सके। ब्राह्मण होने की वजह से ये सब उनके परीवार का ही एक भाग था। प्रोफेसर हार्डी के साथ पत्रव्यावहार और विदेश गमन S Ramanujan and Professor Hardy भारत इस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा था। चारों तरफ भयंकर ग़रीबी थी। इस समय भारतीय और पश्चिमी रहन सहन में एक बड़ी दूरी थी और इस वजह से सामान्यतः भारतीयों को अंग्रेज वैज्ञानिकों के सामने अपने बातों को प्रस्तुत करने में काफी संकोच होता था। इधर स्थिति कुछ ऐसी थी कि बिना किसी अंग्रेज गणितज्ञ की सहायता लिए शोध कार्य को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। इस समय रामानुजन के पुराने शुभचिंतक इनके काम आए और इन लोगों ने रामानुजन द्वारा किए गए कार्यों को लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी.एच.हार्डी के पास भेजा। प्रोफ़ेसर हार्डी उस समय के विश्व के प्रसिद्ध गणितज्ञों में से एक थे। और अपने सख्त स्वभाव और अनुशासनप्रियता के कारण जाने जाते थे। प्रोफ़ेसर हार्डी के शोधकार्य को पढ़ने के बाद रामानुजन ने बताया कि उन्होंने प्रोफ़ेसर हार्डी के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोज निकाला है। अब रामानुजन का प्रोफ़ेसर हार्डी से पत्रव्यवहार आरंभ हुआ। हालाँकि शुरू समय में प्रोफ़ेसर हार्डी को जब रामानुजन का पत्र मिला था तब उन्होंने इसे इग्नोर कर दिए थे क्यूंकि उस समय रामानुजन ने 120 प्रमेयों की एक लम्बी सूची भेजी थी। ये पत्र हार्डी को सुबह नाश्ते के टेबल पर मिले। इस पत्र में किसी अनजान भारतीय द्वारा बहुत सारे बिना उत्पत्ति के प्रमेय लिखे थे, जिनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है। प्रोफेसर हार्डी आजीवन रामानुजन की प्रतिभा और जीवन दर्शन के प्रशंसक रहे। रामानुजन और प्रोफेसर हार्डी की यह मित्रता दोनो ही के लिए लाभप्रद सिद्ध हुई। एक तरह से देखा जाए तो दोनो ने एक दूसरे के लिए पूरक का काम किया। प्रोफेसर हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे। Srinivasa Ramanujan Inventions in Hindi रामानुजन का व्यवहार बड़ा ही मधुर था। श्रीनिवास रामानुजन ज्यादा उम्र तक तो जी नही पाये लेकिन अपने छोटे जीवन में ही उन्होंने लगभग 3900 के आस-पास प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके है। और उनके अधिकांश प्रमेय लोग जानते है। उनके बहोत से परीणाम जैसे की रामानुजन प्राइम और रामानुजन थीटा बहोत प्रसिद्ध है। यह उनके महत्वपूर्ण प्रमेयों में से एक है। इन्होने 3884 इक्वेशन बनाईंइन्होने शून्य और अनन्त को हमेशा ध्यान में रखा और इसके अंतर्सम्बन्धों को समझाने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। वह अपनी विख्यात खोज गोलिय विधि (Circle Method) के लिए भी जाने जाते है। रॉयल सोसाइटी की सदस्यता  रामानुजन के कार्यों के लिए 28 फरवरी, 1887 जन्म स्थान इरोड, जिनमें से कई प्रमेय हार्डी देख चुके थे। पहली बार देखने पर हार्डी को लगा कि रामानुजन की 10 पन्नों वाली गणित के 10 सूत्रों से भरी चिठ्ठी सब बकवास है। उन्होंने इस पत्र को एक तरफ रख दिया और अपने कार्यों में लग गए परंतु इस पत्र की वजह से उनका मन अशांत था। इस पत्र में बहुत सारे ऐसे प्रमेय थे जो उन्होंने न कभी देखे और न सोचे थे। उन्हें बार-बार यह लग रहा था कि यह व्यक्ति (रामानुजन) या तो धोखेबाज है या फिर गणित का बहुत बड़ा विद्वान। रात को 9 बजे हार्डी ने अपने एक शिष्य लिटिलवुड के साथ एक बार फिर इन प्रमेयों को देखा और आधी रात तक वे लोग समझ गये कि रामानुजन कोई धोखेबाज नहीं बल्कि गणित के बहुत बड़े विद्वान हैं, ‘‘शून्य को शून्य से भाग दिया जाये तो भी क्या परिणाम एक ही मिलेगा?’’ रामानुजन का संघर्षमय जीवन Srinivasa Ramanujan Life History रामानुजन का गणित के प्रति प्रेम इतना बढ़ गया था कि वे दूसरे विषयों पर ध्यान ही नहीं देते थे। यहां तक की वे इतिहास, 1918 को उन्हे रॉयल सोसाइटी का फेलो घोषित किया गया। इस सम्मान को पाने वाले वह दूसरी भारतीय थे। उसी वर्ष अक्टूबर के महीने में उन्हें ट्रीनीटी कॉलेज का फेलो चुना गया। इस सामान को पाने वाले वे पहले भारतीय थे। श्रीनिवास रामानुजन का निधन Srinivasa Ramanujan Death एक तरफ उनका कैरियर बहुत अच्छी दिशा में जा रहा था लेकिन दूसरी ओर उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा था। अंततः डॉक्टरों ने उन्हें वापस भारत लौटने की सलाह दी। भारत आने पर इन्हें मद्रास विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई और वो अध्यापन और शोध कार्य में पुनः रम गए। भारत लौटने पर भी इनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ और उनकी हालत गंभीर होती जा रही थी। तेज़ बुखार, धन्यवाद। , लेकिन गणित के क्षेत्र में अपने समय के अनेक दिग्गजों को पीछे छोड़ने वाले श्रीनिवास रामानुजन ने केवल 32 साल के जीवनकाल में पूरी दुनिया को गणित के अनेक सूत्र और सिद्धांत दिए। श्रीनिवास रामानुजन् का परिचय Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi नाम श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (Srinivasa Ramanujan) जन्म दिनांक 22 दिसम्बर, ‘‘यदि तीन केले तीन व्यक्तियों को बाँटे जायें तो प्रत्येक को एक केला मिलेगा। यदि 1000 केले 1000 व्यक्तियों में बाँटे जायें तो भी प्रत्येक को एक ही केला मिलेगा। इस तरह सिद्ध होता है कि किसी भी संख्या को उसी संख्या से भाग दिया जाये तो परिणाम ‘एक’ मिलेगा। रामानुजन ने खड़े होकर पूछा, 1887 को भारत के दक्षिणी भूभाग में स्थित कोयंबटूर के ईरोड नाम के गांव में हुआ था। इनकी माता का नाम कोमलताम्मल और इनके पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर था। रामानुजन् के पिता एक साड़ी की दुकान पर क्लर्क और माँ हाऊस वाइफ थी। रामानुजन जब एक वर्ष के थे तभी उनका परिवार कुंभकोणम आ गया था। इनका बचपन मुख्यतः कुंभकोणम में बीता था जो कि अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। बचपन में रामानुजन का बौद्धिक विकास सामान्य बालकों जैसा नहीं था। वे तीन वर्ष की आयु तक बोलना भी नहीं सीख पाए थे। जब इतनी बड़ी आयु तक रामानुजन ने बोलना आरंभ नहीं किया तो सबको चिंता हुई कि कहीं यह गूंगे तो नहीं हैं। बाद के वर्षों में जब उन्होंने विद्यालय में प्रवेश लिया तो भी पारंपरिक शिक्षा में इनका कभी भी मन नहीं लगा। रामानुजन ने दस वर्षों की आयु में प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में सबसे अधिक अंक प्राप्त किया और आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल पहुंचे। रामानुजन को प्रश्न पूछना बहुत पसंद था। उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी बहुत अटपटे लगते थे। उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी बहुत अटपटे लगते थे। जैसे कि- संसार में पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? जब वे तीसरे फार्म में थे तो एक दिन गणित के अध्यापक ने पढ़ाते हुए कहा,。

Srinivasa Ramanujan / श्रीनिवास रामानुजन् एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, 1920   श्रीनिवास रामानुजन् की प्रारंभिक जीवन Early Life Of Srinivasa Ramanujan रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर, जीव-विज्ञान की कक्षाओं में भी गणित के प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा में वे गणित को छोड़ कर बाकी सभी विषयों में फेल हो गए और परिणामस्वरूप उनको छात्रवृत्ति मिलनी बंद हो गई। एक तो घर की आर्थिक स्थिति खराब और ऊपर से छात्रवृत्ति भी नहीं मिल रही थी। रामानुजन के लिए यह बड़ा ही कठिन समय था। घर की स्थिति सुधारने के लिए इन्होने गणित के कुछ ट्यूशन तथा खाते-बही का काम भी किया। कुछ समय बाद 1907 में रामानुजन ने फिर से बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी और अनुत्तीर्ण हो गए। और इसी के साथ इनके पारंपरिक शिक्षा की इतिश्री हो गई। हालाँकि उन्होंने केवल 13 साल की उम्र में लंदन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एस. एल. लोनी की विश्व प्रसिद्ध त्रिकोणमिति (ट्रिगनोमेट्री) पर लिखित पुस्तक का अध्ययन कर लिया था एवं अनेक गणितीय सिद्धांत प्रतिपादित किए। 15 साल की अवस्था में रामानुजन जब मैट्रिक कक्षा में पढ़ रहे थे उसी समय उन्हें स्थानीय कॉलेज की लाइब्रेरी से गणित का एक ग्रन्थ मिला。

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